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Amar Singh


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नरसिंह

Posted On: 16 Feb, 2012  
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कविता जनरल डब्बा में

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प्रेम पुजारी

Posted On: 16 Feb, 2012  
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कविता में

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स्त्री क्या है…

Posted On: 16 Feb, 2012  
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कविता में

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14 february- एक नजर

Posted On: 14 Feb, 2012  
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जनरल डब्बा में

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सीख

Posted On: 10 Feb, 2012  
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जनरल डब्बा में

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कलयुगी दोहे

Posted On: 9 Feb, 2012  
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कविता जनरल डब्बा में

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कुछ क्षण

Posted On: 8 Feb, 2012  
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कविता में

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3 कविताएं

Posted On: 7 Feb, 2012  
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कविता जनरल डब्बा में

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मिलेगा वो कैसे….

Posted On: 6 Feb, 2012  
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कविता जनरल डब्बा में

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सेवा, स्वार्थ और हम

Posted On: 3 Feb, 2012  
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जनरल डब्बा में

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

के द्वारा: Amar Singh

के द्वारा: Amar Singh

के द्वारा: Amar Singh

के द्वारा: Amar Singh

सबसे पहले मैं आपको धनयवाद देना चाहूँगा की आपने इस लेख को इस योग्य समझा. संत जनों के उपदेश हमारे तंग विचारों के कारण ही कभी हमें लाभ नहीं पंहुचा सके. बेशक हम कितने ही भजन कीर्तन और उनके दोहे गाते रहे, भले ही उन्हें जबानी याद भी कर ले लेकिन उसका कोई लाभ नहीं. जब तक वह सब स्वयं हमारे भीतर से न निकले जो कभी कबीर के मन से निकला, मीरा के गान से निकला, तुलसी के पद बने. उन्होंने वह सब कही नहीं पड़े. अधिकतर तो अनपद ही थे. उनके अपने अनुभव से निकले. जब तक हम भी अपने स्वयं के अनुबव से वह प्राप्त न कर ले जो उन्होंने किया था, मेरे ख्याल से तब तक यह सब व्यर्थ ही है. हाँ वह बात अलग है की उनके अनुभवों के द्वारा हम दिशानिर्देशित अवश्य हो सकते है, उससे लाभ्वान्वित अवश्य हो सकते है. किन्तु फिर भी यह याद रखना भी आवश्यक है की वह हमारे स्वयं के अनुभव नहीं है, जिन्हें हमें अभी प्राप्त करना है.

के द्वारा: Amar Singh

के द्वारा: Amar Singh

अमर सिंह जी, आपका यह लेख निश्चित तौर पर एक पक्षिय है. आपका यह कहना कि महिलाओं के कपड़े पहनने का तरीका पुरुषों को आकर्षित करता है तो शायद आप यह नहीं जानतें कि एक सामान्य पुरुष भी जरूरत पड़ने पर किसी दूसरे पुरुष के साथ जबरन या मर्जी से संबंध बनाता है, इतना ही नहीं पुरुषों की मानसिकता इतनी कुंठित है कि वे छोटी-छोटी बच्चियों को भी अपना शिकार बना लेते हैं. क्या सलवार-कमीज पहनने वाले महिलाओं के साथ कोई हादसा नहीं होता? हो सकता है कुछ हद तक महिलाओं के कपड़े पुरुष को ललचाते हो तो क्या महिलाओं को अब सब कुछ उन्हीं के अनुसार करना चाहिए? कौन सी ऐसी महिला है जिसे पूरी कपड़े पहनने के बाद वह इस बात से आशवस्त हो कि अब वह किसी हैवान की नजरों में नहीं आएगी. अपवाद सभी जगह होते हैं लेकिन भारतीय पुरुषों की मानसिकता बेहद घृणित और विकृत हो चुकी है. यह मेरा अपना दृष्टिकोण है.

के द्वारा: Tamanna

के द्वारा: Amar Singh

के द्वारा: Amar Singh

के द्वारा: Amar Singh

के द्वारा: Amar Singh

के द्वारा: Amar Singh

के द्वारा: Amar Singh

विदेशी भागिता से या विदेशी कंपनी में नौकरी करने में कोई बुराई नहीं नहीं. लेकिन विदेशी कंपनी के हाथो में अपनी अर्थव्यवस्था का अधिक से अधिक जाना भारतीय व्यापारियों के लिए खतरा हो सकती है. नौकरी शब्द ही नौकर से निकला है. और जो भी लोग आज कही भी नौकरी कर रहे है फिर वह चाहे देशी कंपनी हो या विदेशी, चाहे भारत हो या विदेश कही न कही गुलाम ही है, नौकर ही है. जो अपनी महनत, समय को देकर उसकी पूरी पूरी कीमत लेते है. किन्तु अभी यह सब हमारी इचा पर निर्भर करता है की हमें नौकरी करनी है या व्यापार. किन्तु विदेशी कंपनी के हाथो में अर्थव्यवस्था आ जाने पर, और नौकरी पर आश्रित हो जाने पर कम पड़े लिखे लोगो के लिए व्यापार के रास्ते भी बंद हो जायेंगे. फिर टाटा और धीरू भाई अम्बानी का होना मुश्किल हो जाएगा.........

के द्वारा: Amar Singh

विदेशी भागिता से या विदेशी कंपनी में नौकरी करने में कोई बुराई नहीं नहीं. लेकिन विदेशी कंपनी के हाथो में अपनी अर्थव्यवस्था का अधिक से अधिक जाना भारतीय व्यापारियों के लिए खतरा हो सकती है. नौकरी शब्द ही नौकर से निकला है. और जो भी लोग आज कही भी नौकरी कर रहे है फिर वह चाहे देशी कंपनी हो या विदेशी, चाहे भारत हो या विदेश कही न कही गुलाम ही है, नौकर ही है. जो अपनी महनत, समय को देकर उसकी पूरी पूरी कीमत लेते है. किन्तु अभी यह सब हमारी इचा पर निर्भर करता है की हमें नौकरी करनी है या व्यापार. किन्तु विदेशी कंपनी के हाथो में अर्थव्यवस्था आ जाने पर, और नौकरी पर आश्रित हो जाने पर कम पड़े लिखे लोगो के लिए व्यापार के रास्ते भी बंद हो जायेंगे. फिर टाटा और धीरू भाई अम्बानी का होना मुश्किल हो जाएगा.

के द्वारा: Amar Singh

अमरसिंह जी, आपने कुछ अधूरी अधूरी सी बात की है गहराई वाली कोई बात नहीं है.क्योंकि मेरा मानना है की चाहे वालमार्ट जैसी नामी गिरामी कंपनी हो या फिर कोई और विदेशी कंपनी किसी के भी बूते में नहीं है की वो हमको गुलाम बना सके.यदि किसी विदेशी संस्थान में नौकरी करना ही गुलामी है तो शायाद लाखो या करोड़ में भी हो सकते हैं भारतीय विदेशों में जाकर नौकरियां कर ही रहे हैं.देश में कृषि क्षेत्र में होने वाला विदेशी निवेश फिर भी खतरनाक है और मै भी इसके खिलाफ हूँ.मगर उस निवेश के प्रतिशत पर. जहां तक आप सैनिकों की बात कर रहे हैं तो अवश्य वे सम्माननीय हैं. मगर वहां भी उच्च वर्ग में क्या हो रहा है उसके बारे में तो आप जानते ही होंगे.

के द्वारा: akraktale

अमरसिंह जी नमस्कार, मुझे लगता है की आपने सभी को क्रोधी होने के दायरे में लपेट लिया है जबकि सामान्य क्रोध स्वाभाविक प्रवृत्ति है, जबकि अधिक क्रोध या जिनके विषय में आप ने लिखा है वे लोग जो क्रोध पर नियंत्रण नहीं पा रहे है.पहले हमारे समय में पाठशालाओं में शारीरिक व्यायाम भी सिखाया जाता था जिससे छात्र स्वस्थ रहता था. आज स्वस्थ रहने की कोई कक्षा नहीं है.आवश्यक है की घर में ही यदि छात्र जीवन से ही शारीरिक व्यायाम और संयम की शिक्षा दी जाने लगे तो इस दुश्वारी भरे वक्त में भी मनुष्य अधिक क्रोधित नहीं होगा.क्रोध सर्वथा अनुचित है यही सभी धर्म गुरुओं ने सिखाया है. बस अमल की जरुरत है.धन्यवाद.

के द्वारा: akraktale

मान्यवर अमर जी, सादर. रचना से बहुत सी नई जानकारियाँ मिली. परन्तु इस वैचारिक सहिष्णुता का भार केवल आम जन के ऊपर ही क्यों. नीति नियंताओं के ऊपर तो इसका दायित्व सबसे ज्यादा होना चाहिए. अगर उच्चासनो पर बैठे लोग अपने आचरण की गरिमा और अपने कर्तव्यों के अनुकूल कर्म करें तो किसीको ऐसी प्रतिक्रिया देने की आवश्यकता ही क्यों पड़े. ऐसे जोखिम में अपने को क्यों डालना पड़े जिसमें उसकी जान भी जा सकती हो, हाथ पैर टूट सकते हों, या कुछ भी हो सकता हो. संतुलित आचरण की जिम्मेवारी सबकी होती है, किसी वर्ग विशेष से ही इसकी अपेक्षा रखना ठीक नहीं. अच्छा तो यह है कि ऐसी परिस्थिति उत्पन्न होने की आवश्यकता ही न पड़े. धन्यवाद.

के द्वारा: shashibhushan1959

के द्वारा: Amar Singh

प्रिय अमर सिंह जी सार्थक लेख ..आप का निम्न कथन बिलकुल सटीक है ..पर आज लोग अब जागरूक हो रहे हैं ..असलियत छुप नहीं सकती बनावट के वसूलों से .....भ्रमर ५ जो लोग फिल्म देखते समय पूरी तन्मयता से फिल्म की कहानी में शामिल हो जाते हैं तब उन्हें यह लगने लगता है कि उक्त अभिनेता या अभिनेत्री के साथ जो कुछ भी हो रहा है, वह वास्तव में उसी के साथ हो रहा है। जिससे फिल्म में खुशी की समय वह हंसने लगता है और दुख भरे सीन में उसकी आंखों से आंसू आने लगते हैं। इस तरह वह कलाकार उसके अचेतन में इस प्रकार फिट हो जाता है कि वह उसमें स्वयं को देखने लगता है। तभी कई लोग अपने सर्वप्रिय कलाकार की कोई बुराई भी नहीं सुन पाते

के द्वारा: surendra shukla bhramar5

के द्वारा: Amar Singh

अमर सिंह जी ...........लिव इन रिलेशनशिप सही है वह प्रेम की एक परिभाषा है तो उसमे कही न कही एक स्वार्थ की भावना भी है . पुराने ज़माने में हमारे बजुर्ग लड़की या लड़का खुद पसंद करते थे उससे पहले जैसा की साधू -संत बताते है हमारे भारत में सव्य्म्वर होता था .आज का "राखी का सव्य्म्वर "जैसा नही उसमे लड़की की इचाहे होती थी लड़के की भी . जो मैंने यहाँ पुराने ज़माने की दो बातो का जिक्र किया है इन दोनों में ही बिन फेरे हम तेरे जैसी गलत परम्पराए नही थी . इन दोनों में ही लड़की और लड़के को सम्मान मिलता था ,अपने पति का गोत्र मिलता था और सामाजिक इज्जत भी .लेकिन जो आजकल का लिव इन रिलेशनशिप है जिसकी की लोग बहुत ही जोर -शोर से वकालत कर रहे है मुझे लगता है उसमे नारी और रखैल में कोई फर्क नही रह जाता . एक और बात आखिर क्या कारण है की जो गलत चीज़े यूरोपियन देशो में जायज है वाही जायज भारत में भी हो इसे तरीके ढूंढे जा रहे है क्या हम लोग हद्द से ज्यादा समझोतावादी हो गये है जो उनकी संस्कृति को सविकारे क्या हमें अपनी संस्कृति को बचने का अधिकार नही है .

के द्वारा: vikasmehta

के द्वारा: akraktale

विश्वास और अंधविश्वास में हमें पहले उस बारीक अंतर को समझ लेना चाहिए जिसमे कभी कभी कुछ कदमो की दूरी से भी जिन्दगी हाथ से निकल जाती है. मैंने पहले यह बात कही थी की विश्वास के जरिये इंसान कई बारी छोटी छोटी समस्याओं का हल प्राप्त कर लेता है. किन्तु जब कभी उसका विश्वास गलत और आधारहीन तथ्यों पर खड़ा होता है तब उसके सामने असली समस्या तब आती है जब उसके सामने कोई बड़ी विपदा आन पड़ती है या कोई ऐसी बड़ी बिमारी पकड़ लेती है जिससे छुटकारा सही प्रकार के उपचार से ही संभव हो पाता है. गलत विश्वास अर्थात अंधविश्वास के चलते आज लोगो की भावनाओं से खेलने वाले कई बाबाओ का यह अंधविश्वास का धंधा बहुत बढ़िया चल रहा है. जो लोगो को हाथ की सफाई दिखाकर और बड़ी बड़ी दार्शनिक बातो के जाल में उलझाकर उनका आध्यात्मिक, मानसिक, आर्थिक, शारीरिक और अन्य कई स्तरों से उनकी हानि करते है. जिसे लोग बड़ी ख़ुशी से उन्हें भगवान् की संज्ञा देकर गोरवान्वित होते है. किन्तु जब कभी उनकी सच्चाई सबके सामने आती है तब कही जाकर उनमे से कुछ जागरूक लोगो की आँखे खुलती है और कई अंधविश्वास के चलते तब भी सच स्वीकार नहीं करते.

के द्वारा: Amar Singh

आदरणीय संतोष जी, सादर नमस्कार, यहाँ में आपकी एक बात से सहमत हूँ की परम्पराए हमें अपनी जड़ो से जोड़े रखने का काम करती है किन्तु इस प्रकार के अंधविश्वास और कुरीतिया हमे हमारी जड़ो से नहीं जोड़ते अपितु अपनी परम्पराओं को और अधिक मजबूत करने से तोड़ते अवश्य है. उनमे व्याप्त कमजोरियों और कमियों को समाप्त करने से भी रोकती है. एक अन्य प्रतिक्रिया में हमारे एक अन्य मित्र ने यह तर्क दिया है की पीलिया का इलाज झाड़ने से ठीक हो जाता है किन्तु अस्पताल में वह लम्बे इलाज से भी नहीं हो पाता, यहाँ पर इस बारे यही कहना चाहूँगा कि मैं मानता हूँ कि झाड़ने से भी पीलिया ठीक हो जाता है किन्तु वो ठीक होना झाड़ने का चमत्कार नहीं है अपितु वह चमत्कार विश्वास और इच्छा का है. क्योकि भारत में प्रारम्भ से ही लोगो को यही विश्वास रहा है कि झाड़ने से पीलिया ठीक हो जाता है, इसलिए अधिकतर मामलो में यहाँ देखने को मिलता है कि अच्छे से अच्छे डॉक्टर उक्त मरीज को ठीक नहीं कर पाते वह वह व्यक्ति मनोवैज्ञानिक विश्वास के चलते झाड फूक से ठीक हो जाता है. उदहारण के लिए :- एक ऐसा विदेशी व्यक्ति जो इस प्रकार कि बातो में बिलकुल भी विश्वास नहीं करता, वह यदि पीलिया से पीड़ित हो जाता है, उसे यदि हम जबरदस्ती इलाज कराने के बजाये झाड फूक करवा कर ठीक करने कि कोशिश करते है तो वह ठीक होने के बजाये पहले से भी अधिक बीमार हो जाता है. यहाँ पर झाड फूक कि विधि फेल हो जाती है क्योकि उस समय वह व्यक्ति मनोविज्ञानिक रूप से इस विधि से प्रभावित नहीं है.

के द्वारा: Amar Singh

आदरणीय राजकमल जी, मेरा सभी को जवाब न देने के लिए शमा प्रार्थी हूँ. मेरा उद्देश्य कभी किसी को अपनानित करने का कभी भी नहीं रहा है. इस मंच के द्वारा हम सभी ब्लॉगर बंधू स्वतंत्रता पूर्वक अपने अपने विचार जिस प्रकार रख रहे है वह वाकई प्रशंशा का विषय है. जैसा की आप कह रहे है कि बिना कारण जाने अँधेरे में तीर चलाने की कोई तुक नहीं बनती अपनी जगह सही है किन्तु इस लेख के विषय में मैं यहाँ बस यही कहना चाहूँगा कि उक्त घटना कही भी अँधेरे में तीर कि भाति नहीं नहीं क्योकि आज के परिवेश में जो मैंने पढ़े लिखे वर्ग के लोगो के बीच देखा वही सीधे सीधे इस लेख के द्वारा व्यक्त कर दिया. इस कहानी में एक हिन्दू परिवार का उल्लेख हुआ है जो की मात्र एक घटना को बयान करने का माध्यम भर है. अन्य वर्गों में भी इस प्रकार की अनेको कुप्रथाए और अंधविश्वास उपस्थित है. जिन्हें एक साथ एक ही लेख में लिख पाना अत्यंत कठिन है. इस प्रकार के अंधविश्वास और कुरीतिया हमे हमारी जड़ो से नहीं जोडती अपितु अपनी परम्पराओं को और अधिक मजबूत करने से रोकती अवश्य है. उनमे व्याप्त कमजोरियों और कमियों को समाप्त करने से भी रोकती है.

के द्वारा: Amar Singh

प्रिय अमर सिंह जी अभिनन्दन आप का -सुन्दर विचार आप के - प्रेम की सुन्दर व्याख्या की आप ने -सच है प्रेम कोई बधन /डोरी नहीं की गाय बैल जैसा उसे कोई अकेले बाँध ले यह तो असीम है विस्तार है इसका सब के प्रति उमड़ना चाहिए -तब आनंद आएगा -सार्थक लेख मुबारकां ..... वर्तमान में अधिकतर पुरुश / स्त्रीयां अपनी प्रेमिका/प्रेमी, पत्नी/पति एवं अन्य लोगों पर अपना अधिकार जमाना चाहता है तथा अधिकारपूर्वक उन पर अपनी सत्ता जमाने का प्रयास करते रहते हैं जो उन्हें प्रेम के असल भाव से दूर ही ले जाते हैं और उनके मन को द्राान्ति एवं सुख देने के बजाय बेचैनी और अच्चान्ति से भर देते हैं कृपया हिंदी बनाते समय शब्दों का ध्यान रखें - जैसे -आवश्यकता , कोशिश, अशान्ति , शुक्ल भ्रमर ५

के द्वारा: surendra shukla bhramar5

अन्नाभाई आप भारतिय नही हो ये तो साबित हो गया । आप पाकिस्तान या लंडनमे बसे एक स्कोलर हो, ईसलिये आपको ईतनी अच्छी हिन्दी आती है । आपका मकसत है भारतिय समाज और उनकी परंपरा को निचा दिखाना । आप कौन सा सच सुनाना चाहते है । मै एक सच बताउं ? आप की रानी विकटोरिया जब कपडे निकालती थी तो वो क्या हो जाती थी वो आपको मालुम है ? वो क्या हो जाती वो हम भारतिय लोग खुल के नही बता सकते, और न किसीने बताया है । लेकिन सच तो सच ही होता है । ये सच को आप पचा पाओगे, अगर हम खूल के केह दे ? इंडिया अगर शिटहोल है तो ब्रीटन क्या है , गोबरगेस । जो आज भारत के हर कोने मे बदबू मार रहा है । यहा तक के बास ओस्ट्रेलिया से टकरा के यहा तक आती है । बदबू मारना बन्द करो, कितना भी पादोगे भारत की संस्क्रुति को कोई नही बिगाड सकता ।

के द्वारा: bharodiya




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